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मारवाड़ के वीर शिरोमणि मुकनदासजी खीची

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मारवाड़ के वीर शिरोमणि मुकनदासजी खीची के बारे में लोगों को अभी तक अधिक जानकारी नहीं है। इस पेज के माध्यम से मुकनदास खीची की कीरत कथा उजागर करना हमारा उद्देश्य है, साथ ही आज की पीढ़ी जिस तेजी के साथ अपनी भाषा, इतिहास, रीति-रिवाज, अदब-कायदा व संस्कृति से परे होती जा रही है, उनको भी मुकनदास के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से परिचित कराना भी है।

 

मुकनदास खीची को इतिहास में जो स्थान मिलना चाहिए था नहीं मिला, उन्हें इतिहास से गौण कर दिया गया। पांडवों का एक वर्ष का अज्ञातवास कितना कठिन था जबकि मुकनदास खीची के सात वर्ष बालक महाराजा अजीतसिंह की जोगी के भेष में सुरक्षा, पल-पल की नजर रखना कितना कठिन कार्य था। वहीं दुर्गादास राठौड़ युद्ध करना, कूटनीति, राजपूतों को संगठित करना और महाराजा को खोया राज्य पुन: दिलाना के लिए प्रयासों में लगे रहे, तो दूसरी तरफ मुकनदास पर महाराजा को औरंगजेब की नजरों से बचाने का महत्वपूर्ण दायित्व था। अगर मुकनदास अपने कार्य में तनिक भी असफल हो जाते तो क्या दुर्गादास राठौड़ का

 

महाराजा मानसिंह के स्वर्गवास के बाद अहमद नगर के शासक तख्त सिंह जोधपुर की गद्दी पर बैठे। महाराजा तख्त सिंह के बाद उनके पुत्र महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय 1 मार्च 1876 ईस्वी में जोधपुर की गद्दी पर बैठे।

 

महाराजा तख्त सिंह, जोधपुर

= जसवंत सिंह द्वितीय

= जोरावर सिंह

= सर प्रताप सिंह

 

सर प्रताप सिंह अपने स्वार्थी तत्वों के माध्यम से पिता और पुत्रों में आपसी मनमुटाव पैदा करने में सफल हो गए थे। अतः जसवंत सिंह को देश निकाले की संज्ञा में गोडवाड भिजवा दिया। जसवंत सिंह को ऐसे लोगों का सहयोग प्राप्त था जो उन्हें प्रताप सिंह की हर गतिविधियों की जानकारी देते रहते थे। प्रताप सिंह अपने बहनोई जयपुर के महाराजा रामसिंह के पास भी रह कर अपनी योजना की क्रियान्विति करते रहे।

 

जसवंत सिंह द्वितीय ने जोधपुर में 20 जनवरी 1888 ई. को तवारीख महकमा की स्थापना कर मुरारीदान को प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया। जसवंत सिंह द्वितीय का विचार था कि इतिहास के साथ न्याय किया जाए। महाराजाओं की जो भी त्रुटियां रही हो, उस पर पर्दा डालने की बजाय उनका स्पष्ट उल्लेख होता कि आने वाली पीढ़ियां उन तथ्यों से शिक्षा प्राप्त कर सके। लेकिन लोक चर्चा ऐसी भी रही कि सर प्रताप सिंह की निगाह मारवाड़ के सिंहासन पर थी और सब ओर अपने चहेतों को नियुक्त कर रखा था। जिनमें गुमान सिंह खींची उनका विशेष मर्जीदांन था। महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की वर्ष 1895 ईस्वी में अचानक रहस्यमय ढंग से मृत्यु हो गई या विष देकर उनकी हत्या करवा दी गई। इसके साथ ही इतिहास विभाग के अध्यक्ष पद से मुरारीदान को भी हटवा दिया गया। उनके स्थान पर इतिहास विभाग का अध्यक्ष भी रणजीत सिंह को नियुक्त कर दिया गया। गुमान सिंह खींची नहीं चाहता था कि इतिहास का सच सामने आए।

 

जसवंत सिंह के बाद उनके बड़े पुत्र सरदार सिंह मारवाड़ के महाराजा पद का पर सिंहासनरुढ हुए। मगर वह भी 1911 ई. में ही रहस्यमय ढंग से मौत के शिकार हो गए तथा इतिहास विभाग के अध्यक्ष पद से को हटाकर समय गुमान सिंह खींची 1911 में इतिहास विभाग के अध्यक्ष बन गए। यही नहीं, महाराज सुमेर सिंह जी जो बाल अवस्था में थे, उनका अभीवाहक भी गुमान सिंह खींची ही बन गए। इस गुमान सिंह खींची, जो पासवान मुकुंद दास खींची का ही वंशज था, इसके कार्यकाल में फ्रांस में भारी रद्दोबदल करवाए । यहां तक कि मारवाड़ के इतिहास में फेरबदल के कारण प्रमाणिकता ही समाप्त हो गई। विश्वेसरनाथ रेऊ, जो इतिहास विभाग का अधीक्षक था, उसे यह तक लिखने को मजबूर होना पड़ा की ऐतिहासिक सामग्री के संग्रह का यह हाल था जो काम की सामग्री इकट्ठी की जाती थी, वह इस महकमे के अहलकारों के निजी संग्रह की शोभा बढ़ाती थी और महकमे में व्यर्थ सामग्री का ढेर बढ़ रहा था।

 

विश्वेसरनाथ रेउ जो मारवाड़ के इतिहास का लेखक है उसने लिखा है कि इस इतिहास को इस रुप में प्रस्तुत करने के कारण जिन लोगों के स्वार्थों में बाधा पहुंचती थी, उनकी तरफ से लेखक पर अनुचित दबाव डालने और शिखंडीयों के नाम से नोटिसबाजी करने में भी कमी नहीं की गई।

 

इसी सिलसिले में एक समय ऐसा भी आ गया, जब राज्य के कुछ प्रभावशाली लोगों ने षड्यंत्र रच कर लेखक को राजकीय सेवा से ही हटा देने तक का प्रयत्न किया।

 

वर्ष 1911 से 1918 तक ही सुमेर सिंह जी मारवाड़ की गद्दी पर रह सके और वह भी रहस्यमय ढंग से मौत के ग्रास बन गए। इनके कोई पुत्र भी नहीं हो सका था और मात्र 21 वर्ष की अल्प आयु में ही रहस्यमय ढंग से मौत के शिकार हो गए। उन के बाद मारवाड़ की गद्दी पर उनके भाई उमेद सिंह जी का राजतिलक हुआ।

 

जनता राज दरबार के शुभचिंतक लगातार इस प्रकार एक के बाद एक मारवाड़ के महाराजाओं की लगातार रहस्यमई असामयिक मौत हो से स्तब्ध थे। लोक चर्चा होने लगी थी पढ़कर सिंहासन प्राप्त करना चाहते थे। इसलिए इस प्रकार की घिनौनी हरकतें गुमान सिंह खींची जो उनके विशेष चाहते थे उन के माध्यम से करवा रहे थे। मारवाड़ की जनता और राजपरिवार के शुभचिंतकों का विचार बन गया था कि जब तक गुमान सिंह खींची रहेगा तब तक ऐसा ही होता रहेगा। अपनी जुबान खुलकर नहीं खोल सकता था।

 

जब उम्मेद सिंह मारवाड़ के महाराजा की गद्दी पर बैठे तो उनके शुभचिंतकों ने डरते-डरते यह बात उन के कानों तक पहुंचाई तथा आगाह किया कि आप गुमान सिंह खींची गतिविधियों पर कड़ी नजर रखें तथा उनकी हर हरकतों से सावधान रहें। आखिर अजमेर में पोलो खेलने के बाद दरबार की कार में गुमान सिंह खींची की मृत्यु के बाद ही यह मारवाड़ के महाराजाओं की अनाया से होने वाली मौतों का क्रम एकदम थम गया। इससे जनता में होने वाली लोग चर्चाओं को और भी बल मिल गया। जनता में या खुसर फुसर होने लगी की कमान सिंह खींची के माध्यम से ही एक के बाद एक मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय, सरदार सिंह व सुमेर सिंह की हत्या होती रही थी। अजमेर में महाराजा उमेद सिंह की हत्या का प्रयास असफल होने के बाद यह क्रम थम गया।

 

गुमान सिंह के अध्यक्ष रहते हुए इतिहास में भारी फेरबदल करवाए गए। मुकुंददास चंपावत के नाम का लाभ उठाकर जगह-जगह पासवान मुकुंददास खींची करवा दिया गया। आज के साथ काफी परिवर्तन करवा दिए गए। यही नहीं, मारवाड़ के इतिहास में बहुत कूट रचनाएं, काल्पनिक बेबुनियाद, मनघड़ंत जुडवां दी गई। अजीत ग्रंथ, मुनासरे आलमगीरी, फुतहात ए आलमगीरी, हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब, यदुनाथ सरकार, चांद शाह का इतिहास आदि सब को झुठलाकर मारवाड़ का झूठा काल्पनिक बिना आधार का इतिहास में भारी रद्दोबदल करवा दिए गए।

 

महाराजा मानसिंह के समय जब कर्नल टॉड आया था, उस समय दिल्ली में अगर पासवान मुकुंद दास खींची ही अजीत सिंह को लाया था उसने इसका वर्णन क्यों नहीं किया? पासवान मुकुंद दास खींची से क्या रंजिश हो सकती थी? ईश्वरदास नागर ने फुतुहात ए आलमगीरी में पासवान मुकुंददास खींची का क्यों वर्णन नहीं किया? सरकार जो बंगाली निष्पक्ष इतिहासकार था, ने हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब में पासवान मुकुंद दास खींची का क्या वर्णन नहीं किया? मात्र मारवाड़ के इतिहास में ही यह झूठी काल्पनिक बेबुनियाद बातें क्यों जुडवा दी जाती रही? अन्य समकालीन दस्तावेजों में यह परिवर्तन क्यों नहीं है? क्यों पासवान गुमान सिंह खींची का मारवाड़ के अलावा अन्यत्र कहीं बस नहीं चलता था। इस पर निष्पक्ष शोध होना अनिवार्य है।

 

अब आजादी के बाद शोधकर्ताओं के सामने उन्हें जोधपुर की आधारहीन बेबुनियाद झूठी कूट रचनाओं को संदर्भ ग्रंथ मानने की मजबूरी भी है। मगर स्व-विवेक से अन्य समकालीन ग्रंथों का सूक्ष्म निरीक्षण कर वास्तविकता तक पहुंचना अनिवार्य है। जिसकी आज नितांत आवश्यकता है।



मारवाड़ के वीर शिरोमणि मुकनदासजी खीची Photos


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