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चेर राजवंश Cher Rajvansh

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दक्षिण भारत का तीसरा राज्य चेर या केरल था। इस राज्य का मुख्य केन्द्र मालाबार तट के किनारे का आधुनिक केरल राज्य का एक भाग था। इसमें समुद्र और पर्वतीय क्षेत्रों के मध्य की संकरी भूपर्पटी शामिल थी। यहाँ की उत्पत्ति के बारे में (पाण्ड्य तथा चोलों की तरह) सुनिश्चित रूप से बताना कठिन है। कुछ विद्वानों की राय है कि वे द्रविड़ जाति के थे। बाद में उन्होंने आर्य वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय वर्ण में स्थान पा लिया था और अन्य क्षत्रियों से उनके वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित हो गये। जो भी हो यह राज्य पाण्ड्य राज्य के पश्चिम और उत्तर में था।

चेर राजवंश

मालाबार इस राज्य का एक मशहूर बन्दरगाह था तथा रोम से व्यापार इसी बन्दरगाह के माध्यम से होता था। रोमन व्यापारी केरल राज्य से गर्म मसाला ले जाते थे। चेर राजा धार्मिक दृष्टि से बड़े उदार थे क्योंकि इन्होंने रोमन व्यापारियों को मुजिरिम (पेरियर नदी के तट पर वर्तमान कुंगनूर) में अगस्त्य का एक मन्दिर बनवाने की आज्ञा दी।

दसवीं शताब्दों में चेर वंश के शासक रविवर्मन ने यहूदी धर्म तथा ईसाई धर्म प्रचारकों को भी कुछ सुविधाएँ प्रदान की थीं। चेर राज्य का जो कुछ विवरण प्राप्त होता है उसके आधार पर कहा जाता है कि ईसा की प्रथम शताब्दी में पेरुनार नामक राजा यहाँ शासन करता था जो चोलों के साथ संघर्ष में मारा गया. संभवत: 150 ई०के  आसपास उसी के उत्तराधिकारी ने चोल शासक करिकाल के पिता की हत्या की तथा करिकाल ने भी अपने पिता की हत्या का बदला लिया.

कुछ समय बाद अदाम नामक चेर शासक हुआ. उसने चोल शासक करिकाल की पुत्री से विवाह किया तथा इस तरह कुछ समय के लिए दोनों में पुरानी शत्रुता समाप्त हो गयी. इसके बाद शिलप्पादिकारम नामक संगम साहित्य के ग्रंथ में सेनगुत्ततन नामक शासक का उल्लेख मिलता है। शायद वह आदन तथा चोल राजकुमारी की संतान था। कहा जाता है कि उसने पाण्ड्य एवं चोलों दोनों राज्यों को पराजित कर चेर राज्य के प्रभाव को बढ़ाया। सम्भवत: उसके उत्तराधिकारी तथा छोटे भाई कुट्टुवन ने युद्ध में सफलता पाकर चेर राज्य को पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्री तक फैलाया। फिर क्रमशः आन्ध्रों तथा पल्‍लवों के उत्कर्ष के समय चेर राज्य की गति मन्द पड़ गई और वह अधीन राज्य हो गया।

द्वितीय शताब्दी ई० के बाद चेर शक्ति का ह्रास हुआ तथा उसके बाद आठवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक हम उसके इतिहास के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानते। आठवीं शताब्दी में फिर चेरों के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। इस समय एक चेर राजा का पल्‍लव नरेश परमेश्वरन के साथ संघर्ष हुआ था। इस शताब्दी के अन्तिम भाग में चेरों को पाण्डयो ने परास्त कर कोंगुदेश और दक्षिण त्रवनकोर पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। किन्तु चेरों का चोलों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार था तथा इन दोनों राज्यों में वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित हो गया था। चोल राजा परान्तक प्रथम ने चेर राजकुमारी के साथ विवाह किया. किन्तु दसवीं शताब्दी के अंतिम भाग में चेरों तथा चोलों के सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे. दसवीं शती में जब चोलों की शक्ति बढ़ी तब उन्होंने चेर राज्य को अपने अधीन कर लिया। राजराज प्रथम ने उनका जहाजी बड़ा कन्दलूर में नष्ट कर दिया तथा राजेन्द्र ने फिर उनको अधीन कर लिया. फलतः बारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक चेर राज्य पर चोलों का आधिपत्य रहा चोलों के ह्रास पाण्ड्यों के पुनरुत्थान के समय 13वीं शती में चेर राज्य पाण्ड्यों के आधिपत्य में चला गया।

प्रारम्भिक तीन राज्यों का पतन

उपर्युक्त वर्णित तीन राज्यों के राजनीतिक इतिहास की मुख्य दिलचस्पी उनके आपसी तथा श्रीलंका के साथ हुए लगातार युद्धों में है। निरन्तर लड़े गए युद्धों ने इन सभी राज्यों को कमजोर बना दिया। परन्तु उन्होंने अपने प्राकृतिक संसाधनों तथा विदेशी व्यापार से काफी लाभ उठाया। ये राज्य अत्यन्त समृद्ध थे। वे मसाले, गोल मिर्च, हाथी दाँत, मोती, रत्न, मलमल, रेशम, सूती वस्त्र विदेशों को भेज कर बहुत धन कमाते थे। इन राज्यों के व्यापारिक सम्बन्ध रोम, मिश्र, अरब के यूनानी राज्यों, मलय द्वीपसमूह, चीन, श्रीलंका आदि से था। व्यापार के पतन के साथ इन तीनों राज्यों का पतन भी आरम्भ हो गया क्‍योंकि विदेशी तथा आंतरिक व्यापार राजकीय आय का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्रोत था।



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